Authenticity of Vedas क्या वेदों में मिलावट नही है ?
Authenticity of Vedas
क्या वेदों में मिलावट नही है ?
वेदों की प्रामाणिकता
मूर्खो की टोली
विषय ( Subject )
वेद किसे कहते है ?
मिलावट और लुप्त किसी कहते है ?
खिल और खिल सूक्त किसे कहते है ?
- ऋग्वेद सहिंता
- यजुर्वेद सहिंता
- सामवेद सहिंता
- अथर्ववेद सहिंता
मूल और शाखा में भेद
- ऋग्वेद की 21 शाखाएँ
- सामवेद की 1000 शाखाएँ
- यजुर्वेद की 101शाखाएँ
- अथर्ववेद की 9 शाखाएँ
वेद मन्त्र का स्वधाय करने से पहले
- ऋषि
- छंद
- देवता
- स्वर , विनियोग , अर्थ , वर्ण , अक्षर
पदपाठ
पाठ भेद का मुख्य कारण
वेदों में मिलावट और आर्य समाजी
आर्य समाजी अथर्ववेद भाष्यकार
पं. विश्वनाथ विद्यालंकार
अथर्ववेद भाष्यकार पंडित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
( आर्य समाजी )
आर्य समाज पंडित
ऋग्वेद में मिलावट
यजुर्वेद में मिलावट
सामवेद में मिलावट
अथर्ववेद में मिलावट
मिलावट के प्रमाण
आर्य समाजी विद्धवान
*
अन्तिम पाट का अभिप्राय बहुत विचित्र. प्रकार का है । तदनुसार साम आर्चिक
संहिता में ८००० साम थे । उसी के गान १४८२० थे। साम गणना के पुराणस्थ और
चरणव्यूह-कथित पाठों में स्वरूप भेद हो
गया है। उस भेद के कारण इन वचनों का स्पष्ट और निश्चित अर्थ लिखा नहीं जा
सकता । हां, इतना तो निणींत ही है कि आर्थिक संहिता में शतपथ-प्रदर्शित १४४००० अक्षर परिमाण के सब मन्त्र होने चाहिएं। और अनेक स्थानों में ८००० के लगभग साम संख्या कहने से यह भी
कुछ निश्चित ही है कि सामवेद की समस्त शाखाओं में कुल ८००० के लगभग मन्त्र होंगे।
एक और आर्य समाजी
* सम्पूर्ण जीवन चरित्र महर्षि दयानंद सरस्वती जिल्द 1 पेज नंबर 386
* क्या आर्य समाजी के पूर्वज वेदों में मिलावट नहीं मानते थे ?
आइए देखते हैं ?
* जैसे सब को ज्ञात है कि इनके पास वेदों की सहिंता ( बुक्स ) भी मौजूद नहीं थी जर्मनी से छप कर आती तो यह पढ़ लिया करते नहीं तो वेद इनके पास मौजूद भी नहीं थे ।
* उसी के चलते आर्य समाजी जो दयानंद सरस्वती के जमाने में खुद उनके साथ आर्य समाज का प्रचार और दयानंद की मान्यता पर लोगों में उसका प्रचार करते थे ।
* कन्हैयालाल जी कहते हैं दयानंद सरस्वती का विरोध करके क्या फायदा यदि किसी ने अपना स्वार्थ निकालने के लिए मूर्ति पूजा की कोई स्तुति यानि मंत्र को मिला दिया हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि चारों वेद एक किताब की शक्ल में कहीं उपलब्ध नहीं है ।
* अब आर्य समाजी फिर से विलाप करने लगेंगे यहाँ श्रुति कहाँ मन्त्र नही तो उनको
दयानंद सरस्वती कृत
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका विषय 4 पेज नंबर 98 - 99 देख लेना चाहिए । की दयानंद सरस्वती जी ने स्पष्ट किया है कि निगम ,श्रुति ,छंद ,मंत्र सब नाम वेदी के नाम हैं ।
Book
अलबेरूनी लिखित
अलबरूनी का भारत
ALBERUNIS INDIA
[ALBERUNI]
अनुवादक
श्री रजनी कान्त शर्मा एम० ए०
प्रकाशक
भादर्श हिन्दी पुस्तकालय
४९२, मालवीय नगर
इलाहाबाद-३
प्रयम संस्करण )
मार्च सन् १९५०
* ब्राह्मण लोग वेद को लिखने की आज्ञा नहीं देते, क्योंकि इसका उच्चारण विशेप ताल-स्वरों से होता है । वे लेखनो का प्रयोग इसलिए नहीं करते कि कहीं कोई अशुद्धि और लिखित पाठ में कोई अधिकता और प्रभाव न हो जाय । इसका परिणाम यह हुआ है कि वे कई बार वेद को भूल जाने से इसे (वेदों )खो चुके हैं।
( 12 परिच्छेद पेज 102 )
हिन्दू विद्ववानों का मत
* अब वैदिक विद्वानों का भी मत जान लेते हैं जो सनातनी पंडितों की सुप्रसिद्ध पुस्तकों से प्रमाण दिए जाएंगे जिसमें से अधिकतर आर्य समाजी तो नहीं पर उनके समर्थक जरूर कह सकते हैं क्योंकि उन्होंने भी दयानंद सरस्वती की अपनी पुस्तकों में वर्णन किया है इसे पढ़कर बुद्धिमानी व्यक्ति यह निष्कर्ष निकाल सकता है , की आर्य समाजी और दयानंद सरस्वती का कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ समर्थन जरूर करते हैं ।
* जो हवाले दिए गए हैं व नवीन एवं प्राचीन दोनों की किताबें के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं जिसमें हम सर्वप्रथम ऋग्वेद पर बात करेंगे पर फिर यजुर्वेद पर फिर सामवेद फिर अथर्व वेदा पर आए देखते हैं ।
ऋग्वेद में मिलावट
Book
वैदिक-साहित्य का इतिहास
डॉ. राममूर्ति शर्मा
एम. ए., पी. एच. डी., डी. लिट; शास्त्री
प्रोफेसर संस्कृत-विभाग
पजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़
नेशनल लेक्चरर (१९८४-८५)
राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत
* बालखिल्य सूक्त-ऋग्वेद के विन्यास-क्रम के सम्बन्ध में विवेचन करते समय बालखिल्य सूक्तों के स्थान का निर्णय भी महत्त्वपूर्ण है। ये सूक्त संख्या एकादश हैं । ये सूक्त यद्यपि अष्टम मण्डल के अन्त में जुड़े हुए मिलते हैं, तथापि उनका स्वतन्त्र अस्तित्व प्रतीत होता है ।
* प्राचीन ऋषियों ने उनकी प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं किया और न संग्रहकर्ताओं ने उनकी गणना मण्डल और अनुवाकों के विभाजन में की। आचार्य सायण ने भी अपने ऋग्वेदभाष्य में इन सूक्तों का भाष्य नहीं किया, यद्यपि कात्यायन की सर्वानुक्रमणी में उनका उल्लेख है ।
* स्पष्ट है कि बालखिल्य सूक्तों का सम्बन्ध ऋग्वेद अथवा उसके अष्टम मण्डल से नहीं है । अष्टक और मण्डल क्रम में बाधक होने से भी यही बात उचित प्रतीत होती है कि ऋग्वेद के संहिता रूप में आने के बाद उन्हें मनमाने रूप से अष्टम मण्डल के पश्चात् जोड़ दिया गया।
Book
संस्कृत साहित्य का इतिहास
प्राशयन
डॉ. बहादुश्चन्द बाबड़ा
जॉइंट डाइरेक्टर जनरल, आर्कियोलॉजी, भारत सरकार
लेखक
ਕਰਿ ਹੈ
अध्यक्ष : पाण्डुलिपि-विभाग, हिन्दी संग्रहालय,
हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयोग
चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी-१
* महर्षि शौनक ने ऋग्वेद -संहिता मैं १०५८० मंत्र, १५३८२६ शब्द और १२००० अक्षर बताये हैं । इतिहासकारों एवं वेदश विद्वानों ने भावेद ये कुल मंत्र की संख्या १०१६० से लेकर १०५८९ तक विभिन्न संख्याओं में निर्धारित की है। अंतिम गणना स्वामी दयानंद सरस्वती की है। ये मंत्र 11 प्रकार के पदों में विरचित है । page Number86
Book
संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास
प्रथम वेदखण्ड
(संहिता-ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद् एवं वैदिक संस्कृति)
प्रधान सम्पादक:
पद्मभूषण आचार्य बलदेव उपाध्याय
सम्पादक:
प्रो. ब्रजबिहारी चौबे
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान
लखनऊ
( अधयाय 5 पेज नंबर 149 - 150 )
* बालखिल्य सूक्तों की स्थिति- कि जिस इलाजीला आज हमें जो ऋग्वेद-संहिता उपलब्ध है उसमें ११ सूक्त ऐसे मिलते हैं जो बालखिल्य के नाम से विख्यात हैं। इन ११ सूक्तों में कुल ८० मन्त्र हैं और उनका स्थान अष्टम मण्डल के ४८वे सूक्त के बाद है। वस्तुतः अष्टम मण्डल में 9२ ही सूक्त हैं, किन्तु इन ११ बालखिल्य सूक्तों को मिलाकर इसकी कुल सूक्त-संख्या १०३ हो जाती है।
* आधुनिक विद्वान् इनको परिशिष्ट कहकर बाद का जोड़ा हुआ मानते हैं, किन्तु इनकी प्राचीनता के विषय में सन्देह नहीं किया जा सकता। अनुवाकानुक्रमणी के अनुसार ये बालखिल्य सूक्त शाकल-संहिता में नहीं पाये जाते; इनकी सत्ता केवल बाष्कल संहिता में ही पाई जाती है। शाकल-संहिता में इनकी सत्ता न होने के कारण इनका पदपाठ नहीं मिलता है।
* सर्वानुक्रमणी में यद्यपि प्रतीक रूप में इन सूक्तों के आदिम पद का उल्लेख किया गया है, किन्तु अनुवाकानुक्रमणी में अष्टम मण्डल की सूक्तसंख्या में से ये निकाल दिये गये हैं। वहाँ अष्टम मण्डल में ९२ सूक्तों का ही उल्लेख है। ये सूक्त अनुवाकों तथा सूक्तों के विभाग के अन्तर्गत नहीं आते। सायणाचार्य का भाष्य भी इन सूक्तों पर नहीं मिलता।' अनुवाकानुक्रमणी का कथन कि ये बालखिल्य सूक्त शाकल-शाखा के नहीं, सही प्रतीत होता है। आज शाकल-शाखा की संहिता में भी अष्टममण्डल में ४५वें सूक्त के बाद इन्हें जो रख दिया गया है, वह गलत है। इनको वहाँ से निकाल देना चाहिये। बाष्कल-शाखा की संहिता का जब अलग से सम्पादन हो तो उसमें उनको जोड़ देना चाहिये।
* अब प्रश्न यह उठता है कि जब ये सूक्त मूल शाकल-शाखा की संहिता में नहीं थे तब उनको इसके अष्टम मण्डल में ही क्यों जोड़ दिया गया और किसी मण्डल के साथ इनको क्यों नहीं जोड़ दिया गया? इसका उत्तर यह है कि ये सूक्त काण्ववंशी ऋषियों द्वारा रचे गये हैं।
* अष्टम मण्डल पूर्णरूप से काण्ववंशी ऋषियों की ऋचाओं का ही संकलन है, इसलिये काण्ववंशी ऋषियों के रचे बालखिल्य सूक्तों को अष्टममण्डल में ही संकलित कर लिया गया।
Book
* वैदिक साहित्य एवं संस्कृति
(वैदिक साहित्य का इतिहास)
लेखक पद्मश्री डॉ० कपिलदेव द्विवेदी आचार्य
एम०ए० (संस्कृत, हिन्दी), एम०ओ०एल०, डी०फिल्० (प्रयाग),
पी०ई०एस० (अप्रा०), विद्याभास्कर, साहित्यरत्न, व्याकरणाचार्यनिदेशक विश्वभारती अनुसंधान परिषद्
ज्ञानपुर (भदोही) प्रणेता-अर्थविज्ञान और व्याकरणदर्शन, अथर्ववेद का सांस्कृतिक अध्ययन,
वेदों में विज्ञान, वेदों में आयुर्वेद, भक्ति कुसुमांजलिः,
राष्ट्र-गीताञ्जली:, आत्मविज्ञानम्, संस्कृत निबन्ध-शतकम्,
संस्कृत-व्याकरण, (सभी उ०प्र० शासन द्वारा पुरस्कृत) भाषा-विज्ञान एवं
भाषा-शास्त्र, वैदिक साहित्य एवं संस्कृति, साधना और सिद्धि आदि। नपावर
मनमानी
विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी
* ऋग्वेद की शाखाएं
महर्षि पतंजलि (१५०ई०पू०) ने महाभाष्य में ऋग्वेद की २१ शाखाओं का उल्लेख किया है । '
एकविंशतिधा बाहव॒च्यम्' (महा० आह्निक
१) इनमें से केवल 5 शाखाओं का मुख्य रूप से उल्लेख मिलता है । शेष के नाम भी संदिग्ध हैं ।'
'चरणव्यूह' के अनुसार प्रमुख ५ शाखाएँ ये हैं - १. शाकल, २. बाष्कल, ३.
आश्वलायन, ४. शांखायन, ५. माण्डूकायन ।
१. शाकल : संप्रति ऋग्वेद की यही शाखा प्रचलित है। यही शाखा उपलब्ध है । इसी के अनुसार आगे वर्ण्य-विषय, मंत्रसंख्या आदि दिए गए हैं ।
२. बाष्कल : यह शाखा उपलब्ध नहीं है । शाकल शाखा में १०१७ सूक्त हैं,परन्तु बाष्कल शाखा में १०२५ सूक्त थे, अर्थात् ८ सूक्त अधिक थे । इन ८ सूक्तों को भी शाकल शाखा में समाविष्ट कर लिया गया है । एक 'संज्ञान सूक्त' को ऋग्वेद के अन्त में ले लिया है और शेष ७ सूक्तों को 'बालखिल्य सूक्तों में प्रथम ७ सूक्तों में स्थान दिया गया है।
३. आश्वलायन : यह संहिता और इसका ब्राह्मण सम्प्रति उपलब्ध नहीं है । इस शाखा के श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र ही उपलब्ध हैं।
४. शांखायन : यह शाखा उपलब्ध नहीं है । इसके ब्राह्मण, आरण्यक,श्रौत
और गृह्यसूत्र ही प्राप्य हैं।
५. माण्डूकायन : यह शाखा संप्रति अप्राप्य है । (अध्याय 2 पेज 46 )
Book
संस्कृत साहित्य का इतिहास
लेखक डॉ० उमाशङ्कर शर्मा ऋषि'
एम० ए०, डी० लिट्०, साहित्याचार्य,
प्रोफेसर तथा अध्यक्ष संस्कृत विभाग, पटना विश्वविद्यालय
फगाणी गरिकमा माली 'परिणीअकादमी
चौखम्भा भारती अकादमी आकर ग्रन्थों के प्रकाशक तथा वितरक पो० ऑ० बॉक्स नं० १०६५
'गोकुल भवन' के. ३७/१०९, गोपाल मन्दिर लेन.
वाराणसी-२२१००१(भारत)
* सम्पूर्ण ऋग्वेद में दस मण्डल, एक सहस्र सत्रह (१०१७) सूक्त तथा शौनक की अनुक्रमणी (श्लोक४३) के अनुसार १०५८० मन्त्र हैं। अष्टम मण्डल में ४८वें सूक्त के बाद ग्यारह खिल सूक्त हैं जिनमें ८० मन्त्र हैं। सूक्तों की संख्या इसलिए १०२८ हो जाती है। गिनने पर वस्तुतः मन्त्रसंख्या १०५५२ ही होती है और अनुवाक ८५ हैं। ऋग्वेद के दस मण्डलों में सूक्त-संख्या क्रमशः इस प्रकार है।
१९१+४३+६२+५८+८७+७५+१०४+९२ (+११)+११४+१९१=१०१७ (+११)=१०२८ सूक्त। अष्टम
मण्डल में ११ सूक्त खिल या प्रक्षिप्त हैं। खिल सूक्तों को स्वाध्याय के समय पढ़ने का विधान है किन्तु न तो इनका पद-पाठ मिलता है न अक्षर-गणना में इनका समावेश है।
यजुर्वेद में मिलावट
Book
वैदिक-साहित्य का इतिहास
डॉ. राममूर्ति शर्मा
एम. ए., पी. एच. डी., डी. लिट; शास्त्री
प्रोफेसर संस्कृत-विभाग
पजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़
नेशनल लेक्चरर (१९८४-८५)
राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत
यजुर्वेद की सहिंता की रचना
( अध्याय 2 पेज 57 )
इस आधार पर शुक्ल यजुर्वेद के कालक्रम की दृष्टि से निम्नलिखित
चार विभाग किये जा सकते हैं।
(१) १-१८ तक का मूल भाग ।
(२) आगे के ७ (२५ वें अध्याय तक) सर्वप्रथम जोड़े गए होंगे, क्योंकि
ये दोनों भाग सामान्य यज्ञीय कृत्यों से सम्बन्ध रखते हैं।
(३) कर्मकाण्ड का विस्तार एवं विकास अगले १४ अध्यायों की रचना का कारण बना होगा। विस्तार २६ से २६ तक के अध्यायों का (जिसमें प्राचीन यज्ञों का और सूक्ष्म विवरण है) और विकास ३० से ३६ अध्याय तक । (जिसमें कुछ नवीन यज्ञों की विवेचना है) का कारण बना होगा।
(४) अन्तिम भाग ४०वा अध्याय उस समय का जोड़ा हुआ है, जिस समय' कर्मकाण्ड से हटकर ज्ञानकाण्ड की ओर प्रवृत्ति बढ़ रही थी।
Book
संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास
प्रथम वेदखण्ड
(संहिता-ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद् एवं वैदिक संस्कृति)
प्रधान सम्पादक:
पद्मभूषण आचार्य बलदेव उपाध्याय
सम्पादक:
प्रो. ब्रजबिहारी चौबे
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान
लखनऊ
( अधयाय 8पेज न 227 )
* शुक्लयजुर्वेद में जो ब्राह्मणभाग मिला हुआ है वह पाठमात्र से तो क्या गहरी अन्वेषणा से भी प्रतीत नहीं होता। कृष्णयजुर्वेद में यज्ञकर्म की सुविधा के अभिप्राय से प्रत्येक प्रकरण के अन्त में मिलाया गया है तथा वह ब्राह्मण नाम से लिख दिया गया है, किन्तु शुक्लयजुर्वेद में अयातयाम बनाने के अभिप्राय से मन्त्रों के मध्य में मिलाया तथा मन्त्र सा बना दिया गया है; यह ब्राह्मण है ऐसा लिखा नहीं। कात्यायनमुनिकृत सर्वानुक्रमणी से भी यह पता लगता है कि शुक्लयजुर्वेद में भी ब्राह्मणभाग मिला हुआ है।
* कृष्णयजुर्वेद तथा शुक्लयजुर्वेद नामों के पीछे चाहे जो भी कारण रहा हो हमें इस विवेचन से मात्र यही अभिमत है कि मूलयजुर्वेद-संहिता इन दोनों से भिन्न थी। आज वह उपलब्ध नहीं। यजुर्वेद की सम्पूर्ण शाखा-संहिताओं का वही आधार थी । असल यजुर्वेद आज उपलब्ध नही है वैदिक मतवालो ।
( अधयाय 8पेज न 227 )
* आगे लिखते है ।
अधयाय 10 पेज नंबर 262 से 266
माध्यन्दिनसंहिता का स्वरूप-
*उपलब्ध-माध्यन्दिन- संहिता में कुल ४० अध्याय हैं। इस संहिता के आरम्भिक पचीसअध्यायों को मूल तथा अन्त के पन्द्रह अध्यायों को खिल माना गया है। आचार्य उवट तथा महीथर का कथन है कि आरम्भ के पचीस अध्याय तक दर्शपूर्णमास, पितृयज्ञ,अग्निहोत्र, उपस्थान, अग्निष्टोम, वाजपेय, राजसूय, सौत्रामणी तथा अश्वमेध से सम्बद्ध मन्त्र हैं, तथा अन्तिम १५ अध्याय इस वेद का खिल भाग (परिशिष्ट) है ।
* अध्याय २६-४० को भाष्यकारों की परम्परा खिल मानती है। अध्याय 26-29 का खिलत्व न केवल खिल कहने से अपितु मन्त्रों की सामान्य प्रकृति से भी सिद्ध होता है। इन अध्यायों में वे मन्त्र संगृहीत हैं, जिनका विनियोग पूर्ववर्णित मुख्य यागों में नहीं हुआ था।
* यदि ये मन्त्र पूर्व के होते तो मुख्य यागों के मन्त्रों को उद्धृत करते समय इनको भी उद्धृत कर दिया गया होता, अर्थात् इनका भी विनियोग वहीं पर हो गया होता। जैसे, दर्शपूर्णमासेष्टि-विषयक मन्त्र प्रथम दो अध्यायों में क्रमपूर्वक उद्धृत है; किन्तु २६वें अध्याय में भी दर्शपूर्णमासेष्टि के मन्त्र हैं।
* ऐसा प्रतीत होता है कि दर्शपूर्णमासेष्टि के जितने मन्त्र पहले विनियुक्त होते थे, वे सब प्रथम दो अध्यायों में.संगृहीत कर दिये गये। किन्तु बाद में भी कुछ मन्त्र किसी कारण नई रचना या पूर्व अज्ञात मन्त्र की प्राप्ति या शाखान्तर मन्त्र के समावेश से मा.सं. में समाविष्ट हो गये। २६वें अध्याय में पूर्वनिर्दिष्ट अनुष्ठानों से सम्बन्धित मन्त्र हैं; २७वें में पञ्चचितीक-अग्निसम्बन्धी मन्त्र हैं; २८वें में सौत्रामणी के अङ्गभूत पशुप्रयाज, अनुयाज प्रैषमन्त्र हैं; २६ में अश्वमेध सम्बन्धी शेष मन्त्र हैं। यागविषयक अवशिष्ट मन्त्रों का संकलन होने के कारण इन अध्यायों का खिलत्व या परिशिष्टत्व स्पष्ट है।
* इसमें भी यजुष तथा ऋच दोनों प्रकार के मन्त्र हैं। वासिष्ठी शिक्षा के अनुसार इसमें १४६७ ऋचायें तथा २८२३ अथवा २८१८ यजुष् मन्त्र हैं।
* चरणव्यूह के अनुसार या. सं. में १९०० अक् मन्त्र तथा ८८२० यजुष् मन्त्र हैं।' चरणव्यूह के भाष्यकार महिदास इसी श्लोक के व्याख्यान में वा.सं. में ऋक्-मन्त्रों की संख्या १९२५ मानते हैं। पुराणों के अनुसार इस संहिता में कुल मन्त्रसंख्या ८८८० तथा एक पाद है, जिसमें १६०० ऋचायें हैं और ६६८० यजुष् मन्त्र हैं। प्रतिज्ञापरिशिष्ट के अनुसार ऋचाओं, खिल तथा शुक्रिय अध्याय सहित यजुष् मन्त्रों की कुल संख्या ८८०० है।
अथर्ववेद में मिलावट
Book
वैदिक-साहित्य का इतिहास
डॉ. राममूर्ति शर्मा
एम. ए., पी. एच. डी., डी. लिट; शास्त्री
प्रोफेसर संस्कृत-विभाग
पजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़
नेशनल लेक्चरर (१९८४-८५)
राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत
* अधयाय 4 पेज नंबर 82
* कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि १ से ७ तक काण्डों वाले प्रथम भाग में भिन्न-भिन्न विषय वाले दीर्घ सूक्त संगृहीत हैं और १३व से १८वे काण्ड तक के तृतीय भाग में सब ऐसे ही सूक्त संगृहीत हैं जिनमें प्रत्येक एक पृथक विषय से सम्बद्ध है। इस प्रकार १४३ काण्ड में केवल विवाह से सम्बन्धित सूक्त हैं और १८व काण्ड में केवल अन्त्येष्टिविषयक सूक्त । १९वें काण्ड में भैषज, राष्ट्रसमृद्धि एवं अध्यात्म आदि से सम्बन्धित विविविषयक मुक्त हैं ।
* २० काण्ड के अन्तर्गत ऋग्वेद संहिता ही के सोमविषयक सूक्तों को संगृहीत कर दिया है । कुन्तापसूक्त अवश्य नवीन रचना है।
Book
संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास
प्रथम वेदखण्ड
(संहिता-ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद् एवं वैदिक संस्कृति)
प्रधान सम्पादक:
पद्मभूषण आचार्य बलदेव उपाध्याय
सम्पादक:
प्रो. ब्रजबिहारी चौबे
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान
लखनऊ
(अधयाय 12 : 369-71)
* कुन्तापसूक्त- अ.वे. के २०वें काण्ड के दस सूक्तों (१२७-१३६) का एक समुदाय
कुन्ताप'
के नाम से प्रसिद्ध है। इन सूक्तों को खिल माना जाता है। हस्तलेखों में
प्रारम्भ करते समय 'अथ कुन्तापसूक्तानि' तथा इनकी समाप्ति पर
इतिकुन्तापसूक्तान' ऐसा उल्लेख मिलता है। कुन्तापसूक्त की सीमा कितनी है
निश्चित नहीं। आचार्य सायण ने
२०.१२७-१२८ के ३० मन्त्रों को ही कुन्तापसूक्त माना है, किन्तु सम्पूर्ण को वे खिल ही मानते हैं।
Book
* वैदिक साहित्य एवं संस्कृति
(वैदिक साहित्य का इतिहास)
लेखक पद्मश्री डॉ० कपिलदेव द्विवेदी आचार्य
एम०ए० (संस्कृत, हिन्दी), एम०ओ०एल०, डी०फिल्० (प्रयाग),
पी०ई०एस० (अप्रा०), विद्याभास्कर, साहित्यरत्न, व्याकरणाचार्यनिदेशक विश्वभारती अनुसंधान परिषद्
ज्ञानपुर (भदोही) प्रणेता-अर्थविज्ञान और व्याकरणदर्शन,
अथर्ववेद का सांस्कृतिक अध्ययन,
वेदों
में विज्ञान, वेदों में आयुर्वेद, भक्ति कुसुमांजलिः, राष्ट्र-गीताञ्जली:,
आत्मविज्ञानम्, संस्कृत निबन्ध-शतकम्, संस्कृत-व्याकरण, (सभी उ०प्र० शासन
द्वारा पुरस्कृत) भाषा-विज्ञान एवं भाषा-शास्त्र, वैदिक साहित्य एवं
संस्कृति, साधना और सिद्धि आदि। नपावर मनमानी
विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी
( अधयाय 2 पेज नंबर 100 )
* कांड १९ और २० । ये दोनों कांड प्रक्षिप्त ज्ञात होते हैं । पंचपटलिका और शौनकीय चतुरध्यायिका में अथर्ववेद के केवल १८ कांडों का ही उल्लेख है।कौशिक गृह्यसूत्र और वैतान श्रौतसूत्र में भी केवल १८ कांडों के ही मंत्र 'प्रतीक' के रूप में उद्धृत हैं।
* प्रो० मैकडानल का अभिमत : प्रो० मैकडानल ने अथर्ववेद के विषय में ये विचार व्यक्त किए हैं ।१ : १. मूल अथर्ववेद में केवल १३ कांड थे । यह रचनाशैली एवं विषय-विवेचन की दृष्टि से कहा जा सकता है । (२) कांड- १३ के बाद विषयों में एकरूपता एवं क्रमबद्धता है, जो १३ कांडों में अप्राप्य है। जैसे - कांड १४ में विवाह संस्कार, कांड १५ में व्रात्य-वर्णन, कांड १६-१७ में संमोहन मंत्र, कांड १८ में अन्त्येष्टि ।
* कांड १५-१६ ब्राह्मणों के तुल्य गद्य-शैली में हैं । कांड १६ एवं १७ बहुत छोटे हैं। कांड १९ और २० बाद में जोड़े गए हैं । कांड १९ में कुछ अंश परिशिष्ट के तुल्य हैं और कुछ अंशों में पाठ भ्रष्ट हैं । कांड २० के प्राय: सभी सूक्त इन्द्र-स्तुति-परक हैं और ऋग्वेद से संगृहीत हैं । अथर्ववेद की परम्परा के विरुद्ध अन्तिम अध्यायों में सोमयाग वर्णित है । यह अथर्ववेद को चतुर्थ वेद का स्थान दिलाने का प्रयत्न है ।
Book
संस्कृत साहित्य का इतिहास
लेखक डॉ० उमाशङ्कर शर्मा ऋषि'
एम० ए०, डी० लिट्०, साहित्याचार्य,
प्रोफेसर तथा अध्यक्ष संस्कृत विभाग, पटना विश्वविद्यालय
फगाणी गरिकमा माली 'परिणीअकादमी
चौखम्भा भारती अकादमी आकर ग्रन्थों के प्रकाशक तथा वितरक पो० ऑ० बॉक्स नं० १०६५
'गोकुल भवन' के. ३७/१०९, गोपाल मन्दिर लेन.
वाराणसी-२२१००१(भारत)
( अधयाय 2 पेज नंबर 57 )
* इसके अन्त में १० सूक्त 'कुन्ताप-सूक्त
के नाम से प्रसिद्ध हैं (२०/१२७-३६); जिनमें देवता, ऋषि, छन्द या विनियोग किसी का निर्देश नहीं है, इनका पद-पाठ भी नहीं है। ये खिल-सूक्त हैं।
Note : - पाठकों को ध्यान देने की आवश्यकता है कि जिस सूक्त में ऋषि का अता पता ही नहीं है उसमें मिलावट होने में कोई शक हो सकता है भला ?
* तो मित्रों यह सब झोलझाल है वेदों में ! हिंदू मत का कोई ऐसा बड़ा विद्वान पंडित नहीं गुजरा जिसने वेदों में मिलावट को स्वीकार न किया हो परंतु आजकल के मूर्ख वेदों में मिलावट नहीं इसका बीन बजाते रहते हैं क्या मिथ्या है !
* अगर वेदों में एक मंत्र की भी कमी पेशी हो तो हमारा दावा सिद्ध हो जावेगा परंतु मैंने आपके सामने ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किए हैं अंधा बहरा गूंगा वेदों में क्या मिलावट ना मानेगा भला अंधा बहरा गूंगा भी इसको वेदों में मिलावट मानेगा ही मानेगा चंद किताबों के हवाले दिए जैसे हमने पहले ही बता दिया था इस विषय पर चर्चा करने बैठो तो अलग से एक किताब बन जाए मुझे आशा है मैंने जितना बताया विद्वान जनों के लिए काफी होगा आपका मित्र !
( Alhamdulillah )














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