Biography of dayanand saraswati 2 Dayanand saraswati ka ghar se bhag jana

 

Biography of dayanand saraswati 2


Dayanand saraswati ka

 ghar se bhag jana







दयानन्द  सरस्वती  का  घर से भाग जाना 


* इस से पहले दयानन्द जी के बचप्पन का किस्सा संक्षेप में वर्णन किया गया है अगर न देखा होतो यहाँ  देख सकते है  क्लीक देखे है आगे .....


* फिर निघण्टु निरुक्त  और पूर्व मीमांसा  आदि शास्त्रों के पढ़ने की इच्छा करके आंरभ करके पढ़ता रहा और कर्मकाण्ड विषय पढ़ता रहा मुझसे एक छोटी बहन फिर उससे छोटा भाई फिर एक भाई फिर एक बहन  कुल मिला कर  ४  भाई बहन  और में सबसे बड़ा था  मतलब २ भाई २ बहन  हुए थे  तब तक मेरी आयु १६ वर्ष थी पीछे मुझसे छोटी बहन १४ वर्ष की उसको हैजा ( Cholera ) हो गया एक रात्रि नाच गाना हो रहा था नौकर खबर दी की हैजा हुआ है तक तल्कालिन  हकिम बुलाया गया पर औषधि  मिल ने के बाद भी ४ घंटे में उसकी मौत हो गई । 

* सब लोग रोने लगे परन्तु मेरे  ह्रदय में ऐसा धक्का लगा मै  भी मर जाऊंगा सोच विचार में पढ़ गया  मुक्ति के लिए कुछ उपाय करना आवश्यक है  परन्तु ये बात मैंने अपने मन मे रखी किसी से कुछ भी न कहा ।

* इतने में 19 वर्ष की आयु हो गई तब तो मुझे प्रेम करने वाले चाचा थे उनकी भी मृत्यु हो गई मेरे ह्रदय में और भय आने लगा  ( फट गई ) ये बात तो मैंने माँ बाबा से तो नही की किंतु मित्र जनो के पास कहा कि ये संसार कुछ सब को मृत्यु अवश्य है ( गुरुजी आपको पता चला मौत क्या है मोक्ष मिला या नही 😂😂 )
मेरा मन गृहाश्रम ( घर संसार ) मे नही लग रहा बाबाजी जी को मुफ़्ती रोटी खानी थी इसलिए संन्यासी बनने का विचार मन मे आने लगा कोई की वहाँ भिक्षा से काम चल जाता है बाबाजी की जिम्मेदारी से भागना था भाई बन्दू में सबसे बड़े होने के बाद भी बरहाल आगे देखते है ये बात माँ पीता को बताई तो उन्होंने काहा इसका विवाह कर देना चाहिए ।

* जब मुझे मालूम हुआ कि 20 वर्ष में मेरा विवाह कर देंगे तब मित्रो से काहा की मेरे माता पिता को समझओ अभी विवाह न करे । तब उन्होंने जैसे तैसे 1 साल विवाह रोक दिया तब मैंने पिता जी से कहाँ की मुझे काशी में भेज दो व्याकरण आदि पढ़ आऊँ ( पिता जी  को पता था कि तुम्हारा शैतानी दिमाग मे क्या चल रहा है जिम्मेदरी से जान छुड़ाना चाहता है ) इसलिए कहाँ की कही नही जाना है जो पढ़ना है यही पढ़ो और अगले साल तेरा विवाह भी होगा लड़की वाले नही मानते और हमको अधिक पढ़ा कर क्या करना है ?
( लोगो को गुमराह और क्या ) जितना पढ़ लिया वही बहुत है फिर ( शैतानी दिमाग ने चाल चली ) पिता आदि से कहाँ की मैं पढ़कर आऊँ तो मेरा विवाह कर देना ।

*  तब माता भी विपरीत हो गई कि हम कही नही भेजते और अभी विवाह करेंगे तब मैंने चाहा अब सामने अच्छा नही फिर 3 कोश ग्राम में एक अच्छा पंडित था वहा जा कर पढ़ने लगा पर वहा जाकर की यही कहने लगा कि मुझे गृहाश्रम में मन नही लगता
( क्यों कि खाखा कर तोन जो निकल गई थी  तो काम काज काहाँ से होता भला दिमाग मे भिक्षा जो भरी थी जो मनु महाराज की आज्ञा है )


मनुस्मृति 6 : 43

मनुस्मृति 6 : 55

* फिर माता पिता ने मुझे बुलाकर विवाह की तैयारी कर दी तब तक मे 21 वर्ष का हो गया था । जब में ये समझ गया था कि अब ये मुझे विवाह करा कर छोड़ेगे 
फिर  सवंत 1903 ( 1846 ईस .वी सन ) के वर्ष घर छोड़ के शाम के समय मे भाग उठा ( अफसोस बेचारे माता पिता क्योंकर ऐसे संतान को जन्म दिया )


" धिक तँ सुतंय : पितृरिप्सीतार्य ,
क्षमोअपिसन्न  प्रतिपदयेद ,
जातने कीं तेन सुतेन कामं ,
पितुने चिंता ही  सतुधद्ररेदयः ।। "

अर्थात : - उस पुत्र को धिक्कार है , जो सामर्थ होते हुए भी पिता के मनोरथ को पूर्ण करने में उघत नही होता जो पिता की चिंता को दूर नही कर सकता उस पुत्र के जन्म में क्या प्रयोजन है ?
 ( क्या फायदा है ऐसे पुत्र का  )

* 4 -5 किलोमीटर एक गांव था वहाँ जा कर रात में रुक गया फिर दूसरे दिन शाम के समय वहाँ से निकल कर 15 किलोमीटर चला  बीच बीच मे नित्य चलने का आरंभ किया तीसरे दिन मैंने किसी व्यक्ति से सुना कि किसी का लड़का घर छोड़कर भाग गया है उसकी तलाश में पैदल और घोड़ सवार आये थे ।

* मेरे पास कुछ रुपये , अंगूठी और भूषण 
( लॉकेट वगैरा ) लुटेरों ने लूट लिया बेचारा 😂😂😂
फिर  वहाँ एक ब्रह्मचारी ( बलात्कारी ) मिला उसने कहा तुम ब्रह्चारी ( बलात्कारी ) बन जाओ
 ( बलात्कारी इस लिये नियोग में इनका उपयोग ज्यादा होता है 1st ऑप्शन ) उसने मुझे दीक्षा दी और नाम चैतन्य रखा और काषाय वस्त्र भी करा दिए ।



* जब मै वहा अहमदाबाद के पास कोठा गांगड जो कि एक छोटासा राज्य है वहाँ कोई जान पहचान का मिल गया तो उन्होंने पूछा तुम यहाँ क्या कर रहे हो और काहा जाना चाहते हो ( जहन्नुम में 😂 ) मैने कहा घर से आया हु देश भ्र्मण ( घूमना ) चाहता हु ( झुट वैदिक ईश्वर क्षमा भी नही करता पता है न ) उसने कहा कि तूने काषाय वस्त्र पहन कर घर छोड़ दिया है मैंने कहाँ की मैंने घर छोड़ दिया है ( क्यूंकि मुझसे काम काज न हो सकेगा 😎 ) फिर वहां से निकल कर  नीलकण्ड महादेव की ओर गया जहाँ कई स्वमी और ब्रह्मचारी 
(बलात्कारी ) थे उनके पास गया और उनसे सत्संग किया ।

* जो व्यक्ति मुझे मिला उसने पिता जी को पत्र लिखा कि मुझे तुम्हारा पुत्र मिला है और संन्यासी बन चुका है , तो पिता जी ने कुछ सिपाही लेकर वहाँ पहुचे और वहा खोज की मै पंडितों के बीच मे बैठा था वहा पहुँच के बोले तू हमारे परिवार में कलंक लगाने वाला पैदा हुआ है ( अंकल जी परिवार में नही पूरी मानव जाति पर कलंक है ये व्यक्ति  )  फिर झुट मैने कहाँ किसी आदमी के बहकावे में चला आया और मैने बहुत दुख पाया अब मैं घर आना चाहता हूँ । 

* परंतु आप आये यह अच्छा हुआ तो मै आपके साथ साथ घर चलूँगा तो भी क्रोध के मारे मेरे गेरू के रंगे कपड़े और एक तंबू को तोड़ फाड़ कर के फेक दिया और वहाँ भी बहुत खरी - खरी  सुनाई और बोले कि तू अपनी माँ की जान लेना चाहता है मैंने कहा अब में घर को चलूँगा ( जो व्यक्ति स्वयं के माता पिता का न हो सका वो किसका हो सकता है भला फिर शैतानी दिमाग चलने लगा ) उस पहर रात का समय था परंतु में भागने का उपाय देख रहा था ।  ( झुट वैदिक ईश्वर क्षमा भी नही करता पता है न ) 

* सो जब 3 रात के 3 बजे के पीछे  प्रहर  में लघुशंका ( पैशाब , पाखाना ) का बहाना बनाकर भाग गया और 1/2 किलोमीटर पर एक मंदिर था उसके ऊपरी भाग में एक गुफा  में पेड़ के सहारे चढ़ गया और पानी से भरा लोटा भर के छिप कर बैठ रहा , जब चार बजे का समय हुआ तब मैंने उन्ही सिपाहियों मे से मेरे बारे में पूछता सुना तब मैं और भी छुप गया ऊपर बैठा सुनता रहा ( वाहहह क्या कहानी बनाई है 👌👌 🚑 ) वे लोग ढूंढ के चले गये मैं उसी मंदिर के शिखर पर दिन भर बैठा रहा जब अंधेरा हुआ तब उस पर से उतरा , और किसी पूछकर 2 किलोमीटर पर एक गांव था उसमें रुक के अहमदाबाद होता हुआ बड़ोदरे शहर में आकर ठहरा ।

* फिर किसी दक्षिण पंडित से संन्यासी की दीक्षा ली
तब उन्होंने मान लिया और उसी ठिकाने तीसरे दिन संन्यास की दीक्षा दण्ड ग्रहण कराया और दयानंद सरस्वती नाम रखा ( तंबाकू , गांजा और हुक्का पीने वाले बाबाजी ) तो ये थी घर से भाग जाने का किस्सा तो सोचों मित्रो जो माता पिता के बारे जरा नही सोच सकता झुट की सीमा पार कर दी और ये दुनिया का कोनसा  धर्म है जो इसी शिक्षा देता है कि माँ बाप को छोड़ के ऐसा काम करो या ऐसी शिक्षा देता भी हो ये आप समझे  और  भी ऐसे किस्से आगे आते
 रहगे ........................ धन्यवाद 

दयानंद सरस्वती का बच्चपन


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